समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत की मेरी दृष्टि
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समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत की मेरी दृष्टि
मेरा लक्ष्य ऐसे भारत की कल्पना को मजबूत करना है, जहाँ समृद्धि, सुरक्षा, सामाजिक सम्मान, पारदर्शिता और सुशासन का वातावरण हो।
ऐसा भारत जहाँ नागरिकों को भयमुक्त वातावरण मिले, व्यापार ईमानदारी और विश्वास के आधार पर हो तथा प्रत्येक व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को भी समझे।
हमारी राष्ट्रीय दृष्टि
- समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत।
- भयमुक्त और भ्रष्टाचार-मुक्त वातावरण।
- पारदर्शी तथा उत्तरदायी शासन।
- युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार।
- स्वरोजगार और उद्यमिता के अधिक अवसर।
- जातिवाद और सामाजिक भेदभाव में कमी।
- जल, जमीन और जंगल की रक्षा।
- पर्यावरण-अनुकूल विकास।
- भारतीय शिक्षा-पद्धति और संस्कारों का संरक्षण।
- परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी।
- भारत को विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में स्थापित करना।
कर-व्यवस्था संबंधी विचार
प्राचीन भारतीय शासन-व्यवस्था से जुड़े कुछ संदर्भों में कर को नागरिक की आय के एक निश्चित अंश से जोड़कर देखा गया है। इसी विचार से प्रेरित होकर ‘आत्मनिर्भर भारत’ पुस्तक में सरल, कम-दर और व्यापक भागीदारी वाली कर-व्यवस्था का प्रस्ताव रखा गया है।
इस दृष्टिकोण का मूल उद्देश्य है:
- कर-व्यवस्था को सरल बनाना।
- कर-अनुपालन को स्वैच्छिक और सहज बनाना।
- कर-चोरी की प्रवृत्ति को कम करना।
- व्यापार और उत्पादन को प्रोत्साहन देना।
- राजस्व-संग्रह को व्यापक बनाना।
- नागरिक और सरकार के बीच विश्वास बढ़ाना।
दीर्घकालिक लक्ष्य
आने वाले वर्षों में अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता जैसी चुनौतियों पर प्रभावी ढंग से कार्य किया जाना चाहिए।
कम कर-दर, अधिक उत्पादन, अधिक निर्यात, बेहतर प्रशासन, जिम्मेदार नागरिकता और मजबूत आर्थिक गतिविधियों के माध्यम से भारत को समृद्ध और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
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